पिछले काफ़ी दिनों से ब्लॉग पर नारीवादियों और पुरूषवादियो के बीच एक अघोषित जंग देख रही हूँ । स्त्री देह विमर्श हो या महिलाओं द्बारा पुरुषों के सामूहिक मानसिक बलात्कार का बयान ब्लॉग को छिछला और स्तरहीन ( यह मेरी निजी राय है ) बना रहे है। कहीं नारियां मर्दों के ख़िलाफ़ लामबंद हो रही हैं तो कहीं पुरूष नारियों को ईश्वर की भूल करार देने पर तुले है। दोनों ओर से मानसिकताओं को छोटा बताने और बनाने का मिशन चल रहा है। पूरा ब्लॉग जगत वर्गों में बंट गया लगता है। ब्लॉग मर्द और औरत की जंग के लिए रणभूमि में तब्दील हो गया है। महिला का ब्लॉग होगा तो वहां पुरुषों के लिए जहर उगला होगा और पुरूष का ब्लॉग हुआ तो चोखेरबालियों पर तंज किया होगा। लांछनों और प्रति-लांछनों का दौर ख़तम होने का नाम ही नही ले रहा। इससे भला तो अंग्रेजी का ब्लॉग है जहाँ इस तरह की लड़ाई नही मिलती।
मन ये देख कर व्याकुल है। हम और अन्य ब्लॉगर जो इस जंग को गेर जरूरी समझते है, वो बेचारे इस जंग में बेवजह ही पिसे जाते है। माना कि आपमें लिखने का हुनर है और लेखन का शौक भी, तो इस कला तो केवल वर्ग विवाद में जाया मत कीजिये। यकीन नही होता कि इतने प्रतिभावान और समझदार ब्लॉगर किस चक्कर में पड़ गये है। क्या हम ब्लॉग को केवल ब्लॉगर के रूप में नही चला सकते। क्यों ब्लॉग जगत को महिला और पुरुषों मैं बाँट रहे हैं।
मैं ख़ुद एक महिला हूँ और मुझे पसंद नही कि यहाँ किसी भी वर्ग और उनकी शारीरिक असमानताओं या चरित्र विशेषताओं पर चर्चा की जाए। ब्लॉग जगत अपने विचारों को कहने सुनने का एक बहुत ही अच्छा जरिया है। यहाँ आप बिना ये सोचे कि महिला हैं या पुरूष अपने विचारों, अपनी कला और संवेदना को दूसरों के सामने रख सकते है। ब्लॉग मंच है अभिव्यक्ति का, वर्ग विशेष की त्रुटियां बताने का अड्डा नही है ये। इस राजनीति से इसे दूर ही रखा जाए अच्छा होगा। वैसे भी इस विवाद ( श्रेष्ठ कौन ) का हल तो स्वयं भगवान् भी नही बता पाए तो हम किस खेल की मूली हैं। दोनों वर्ग एक दूसरे की खामियां बताते रहेंगे और सच मानिए एक दूसरे के बिना इनका गुजारा भी नही। क्या चोखेरबलिया अपने घर के पुरुषों (पति, भाई, पिता ) को भी इसी तराजू में तोलती हैं और क्या कथित पुरुषवादी अपने घर की महिलाओं (माँ पत्नी, बहन ) को भी ईश्वर की भूल मानते हैं. सच तो ये है कि दोनों एक दूसरे के पूरक है और तभी दुनिया भी चलती है।
मेरी सलाह मानिए और इस वर्गीय और सनातन दुश्मनी को त्याग दीजिये। (मुझे यकीन है कि हर ब्लॉगर (जो इस लड़ाई में तन और मन से जुटा हुआ है।) यही कहेगा कि यहाँ कोई दुश्मनी नही, ये तो मुद्दों और विचारों की लड़ाई है। हम भी तो यही कह रहे है कि मुद्दे और भी हैं ज़माने में इस मुद्दे के सिवा... कुछ उन पर भी नज़र डालिए।
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Thursday, September 4, 2008
Tuesday, September 2, 2008
वनिशा, ईशा और पिया...
अभी हाल ही में फोर्ब्स पत्रिका ने टॉप 150 कुबेरपतिओं की बेटियो के बारे सर्वेक्षण किया जिसमे लक्ष्मी मित्तल और रिलाएंस के मुकेश अंबानी की बेटियों ने बाजी मारी. लक्ष्मी मित्तल की बेटी वनिशा (इसकी शादी में मित्तल ने छह करोड़ डॉलर खर्च किए थे.एक भाई है और दोनों के नाम पर ही मित्तल की अकूत सम्पति है.) का नाम सबसे ऊपर रहा. दूसरे नंबर पर रही मुकेश की १६ साल की बेटी ईशा (एकमात्र संतान, रिलाएंस में फिलहाल आठ करोड़ की हिस्सेदारी, मुकेश की एकमात्र वारिस) और तीसरे नंबर पर रही भारतीय कुबेरपति कुशलपाल सिंह की बेटी पिया सिंह. यानि पहले तीनो स्थान भारतीय बेटियों के नाम रहे. दुनिया भर के अरबपतियों में सबसे ऊपर भारतीय और उनकी बेटियाँ. मन में एक गर्व सा आ गया. भारत तरक्की कर रहा है. इन बेटियों पर हमें गर्व है और उम्मीद भी की अपने पिताओं की तरह ये भी दिन दूनी और रात चौगनी तरक्की करेंगी.
तस्वीर का एक पहलू ये है जहा भारतीय पिताओं के साथ साथ उनकी बेटियों की भी दुनिया भर में धूम मची है और तस्वीर के दूसरा पहलू वो है जहाँ मजबूर और गरीब भारतीय बाप धन के अभाव में बेटी की शादी उससे दुगनी उम्र के आदमी के साथ कर रहा है. कहीं पेट भरने के लिए बेटियाँ दूसरे घरो में कामकर रही हैं और कुछ शरीर बेच रही है. कुछ दहेज़ के लिए जलाई जा रही है और कुछ खुद ही दहेज़ एकत्र करने के मिशन में मशीन बन कर काम किए जा रही है. एक ही वर्ग में इतनी असमानता भारत में ही देखने को मिल सकती है. कुछ बेटियों का भविष्य सूरज की तरह उजला है और कुछ का रात की तरह काला जहाँ सवेरा कब होगा पता नही.
एक तरफ़ वनिशा, ईशा और पिया और दूसरी तरफ़ ये बेटियाँ, समझ नही आता भारत की असली तस्वीर कहाँ है. ....
तस्वीर का एक पहलू ये है जहा भारतीय पिताओं के साथ साथ उनकी बेटियों की भी दुनिया भर में धूम मची है और तस्वीर के दूसरा पहलू वो है जहाँ मजबूर और गरीब भारतीय बाप धन के अभाव में बेटी की शादी उससे दुगनी उम्र के आदमी के साथ कर रहा है. कहीं पेट भरने के लिए बेटियाँ दूसरे घरो में कामकर रही हैं और कुछ शरीर बेच रही है. कुछ दहेज़ के लिए जलाई जा रही है और कुछ खुद ही दहेज़ एकत्र करने के मिशन में मशीन बन कर काम किए जा रही है. एक ही वर्ग में इतनी असमानता भारत में ही देखने को मिल सकती है. कुछ बेटियों का भविष्य सूरज की तरह उजला है और कुछ का रात की तरह काला जहाँ सवेरा कब होगा पता नही.
एक तरफ़ वनिशा, ईशा और पिया और दूसरी तरफ़ ये बेटियाँ, समझ नही आता भारत की असली तस्वीर कहाँ है. ....
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