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Monday, September 1, 2008

अपनी भूल सुधारे कौन....

लाखों तारे आसमान में नीचे इन्हे उतारे कौन,
काँटों के सौदागर सारे घर और द्वार बुहारे कौन.
नसीहतों से भरे टोकरे लिए खड़े हैं लोग तमाम,
मुल्लाओं की महफ़िल में अपनी भूल सुधारे कौन.
तालीमों की किसे जरूरत किसको इंसानों से काम,
दरवाजे पर दस्तक देकर मेरा नाम पुकारे कौन.
खुशहाली में सभी पूछने आते थे मेरे हालात,
लेकिन तन्हाई के लम्हे मेरे साथ गुजारे कौन.
हालात से समझौतों में खामोशी बन गया जमीर,
सन्नाटे में चौराहे पर दिल की बात गुहारे कौन..

Saturday, August 2, 2008

चंदा की रोटी...

चंदा जैसी रोटी को खाने की जिद पाले है.

इंसां लार टपकती कितनी लंबी लीभ निकाले है.

बिजली के नंगे तारों का खौफ दिलो में बैठा है.

इस कीमत पर ही आंखों ने देखे आज उजाले हैं.

नर्म रोटिया सिर्फ़ अमीरों के हिस्से में आयी हैं.

गुरबत के चूल्हों पर तो बस पत्थर गये उछाले हैं.

इमां की कश्ती पर बैठे कुछ ही मांझी ऐसे हैं.

दौलत के बहते दरिया में जो पतवार संभाले हैं.

पैदा होते हम कागज़ के पैर लिए तो अच्छा था.

इस दुनिया में सब कागज पर सड़क बनाने वाले हैं.

इंसां की काली करतूतों से गाफिल यूँ लगता है.

आने वाले दिन मावस की रातों से भी काले हैं.

विशाल गाफिल से साभार.