माँ ने कभी अपने जीवन में
छतरी का उपयोग नहीं किया
क्योंकि
बारिश में उसने
घर के बाहर कभी कदम नहीं रखा।
माँ ने कभी चप्पल नहीं खरीदी
क्योंकि
दादी की पुरानी चप्पल
फेंक नहीं सकते थे।
माँ ने कभी
ताजी रोटी नहीं खाई
क्योंकि
घर में नौकर
नहीं थे।
माँ ने कभी
नई साड़ी नहीं पहनी
क्योंकि
बुआओं को
हर तीज-त्योहार पर
शगुन भेजना जरुरी होता था।
माँ कभी भी
पलंग पर नहीं सोई
क्योंकि
पलंग सिर्फ
दादा,बाबूजी और चाचाजी
के लिए था।
माँ ने कभी
बाजार नहीं देखा
क्योंकि
उसकी अपनी कोई जरुरत
ही नहीं होती थी।
शोभना चोरे के सौजन्य से....
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Tuesday, July 28, 2009
Monday, September 1, 2008
अपनी भूल सुधारे कौन....
लाखों तारे आसमान में नीचे इन्हे उतारे कौन,
काँटों के सौदागर सारे घर और द्वार बुहारे कौन.
नसीहतों से भरे टोकरे लिए खड़े हैं लोग तमाम,
मुल्लाओं की महफ़िल में अपनी भूल सुधारे कौन.
तालीमों की किसे जरूरत किसको इंसानों से काम,
दरवाजे पर दस्तक देकर मेरा नाम पुकारे कौन.
खुशहाली में सभी पूछने आते थे मेरे हालात,
लेकिन तन्हाई के लम्हे मेरे साथ गुजारे कौन.
हालात से समझौतों में खामोशी बन गया जमीर,
सन्नाटे में चौराहे पर दिल की बात गुहारे कौन..
काँटों के सौदागर सारे घर और द्वार बुहारे कौन.
नसीहतों से भरे टोकरे लिए खड़े हैं लोग तमाम,
मुल्लाओं की महफ़िल में अपनी भूल सुधारे कौन.
तालीमों की किसे जरूरत किसको इंसानों से काम,
दरवाजे पर दस्तक देकर मेरा नाम पुकारे कौन.
खुशहाली में सभी पूछने आते थे मेरे हालात,
लेकिन तन्हाई के लम्हे मेरे साथ गुजारे कौन.
हालात से समझौतों में खामोशी बन गया जमीर,
सन्नाटे में चौराहे पर दिल की बात गुहारे कौन..
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