Wednesday, August 13, 2008

रूपा नाम है उसका...

रंग साफ़, आँखे बड़ी बड़ी, नाक ठीक ठाक और बाल भी करीने से बंधे हुए. काम करने में तेज़, झाडू, कटका, बर्तन, कपड़े और दूसरे घर के काम. सभी कुछ मिनटों में और मुस्कुराते हुए निपटा डालती है. हाँ, करते हुए उसका ध्यान टीवी की तरफ़ जरूर रहता है. सीरियल नही देखती, बल्कि फिल्मी गाने ( नई फ़िल्मों के) पसंद हैं उसको. अब उसकी उम्र पर नजर डालिए- महज़ ग्यारह साल, दूसरी क्लास तक पड़ी थी फ़िर माँ ने अपने साथ घरो में काम करने के लिए लगा दिया. पड़ोसी के घर आती है रोज. फ़िर सन्डे को मेरे घर भी आ जाती है. हम ऑफिस जाने वाले सन्डे को ही ठीक तरह सफाई कर पाते है. सो मैं उसे बुला लेती हू मदद के लिए. दरअसल मेरा आठ महीने का बेटा उसे बहुत पसंद करता है. वो भी बड़े ही मन के साथ उसे खिलाती है उसे. कभी कभी तो उसके खिलौनों के साथ वो भी खेलती है. धीरे धीरे वो मुझसे खुल गयी तो मैंने उससे बहुत कुछ पूछा.... उसके पाच भाई बहन हैं, पापा दिहाडी मजदूर हैं और मम्मी घरो में काम करती है. अब वो भी करने लगी है, पड़ना चाहती थी पर पैसे नही है पड़ने के लिए. कपड़े भी कई घरो से मिल जाते है. सबसे छोटी बहन ८ महीने की है. जब दो महीने की थी तभी से माँ उसे घर पर रूपा के हवाले करके काम पर चली जती थी. बहन अब उसे ही माँ समझती है. दो भाई सड़क किनारे भुट्टे बेचते है और शाम को वो भी हाथ बंटाने चली जाती है. एक कमरे के मकान में रहते है. पापा बाहर सोते हैं. उसे अपनी दिनचर्या बताई. सुबह चार बजे उठना...सबके लिए खाना बनाना, छोटी बहन को नहलाना फ़िर भाइयों को स्कूल भेजना. (भाई स्कूल से आने के बाद भुट्टे बेचते हैं.) फ़िर खाना खा कर माँ के साथ काम पर निकलना. तीन बजे तक पाँच घरो का काम निपटाती है. फ़िर घर जाकर माँ के साथ खाना खाती है (वैसे कई घरों में कुछ ना कुछ खाने को मिल जाता है. ) चार बजे छोटी बहन (आजकल इसे सात साल की दूसरी बहन संभालती है.) को साथ लेकर भाइयों के साथ भुट्टे बेचना. रात नौ बजे तक ये काम चलता है. फ़िर घर आकर माँ के साथ खाना बनवाने में मदद करती है फ़िर बिस्तर पर जाती है. मुझे अचम्भा होता है इस जरा से लड़की की हिम्मत देखकर ......इतनी कम उम्र और इतना काम ....इस उम्र में तो बच्चे पढ़ते हैं, खेलते हैं और रंग बिरंगे सपने देखते हैं.

उसे सजने और टीवी देखने का शौक है....में अपने पुराने सूट उसे दे देती हूँ और अपनी कभी कभी उसे साप्ताहिक बाजार से टोप्स कड़े, और क्लिप भी खरीद देती हूँ.उसे बड़ा अच्छा लगता है. जब भी वो मेरे घर में काम करती है तो असल में काम तो मैं करती हूँ और मेरी मदद वो करती है. जैसे रूपा कपडे सुखा दे, डस्टिंग कर दे, दूध उबाल दे या मन्नू के साथ खेल ले.. उस दौरान टीवी चलता रहता है. पता नही क्यों उससे काम कराने को दिल नही मानता. उस दिन वो बड़ी खुश रहती है और सन्डे मनाती है. घर जाते समय में उसके हाथ में बीस का नोट रखती हूँ जो उसकी माँ भी उससे नही मागती (एक दिन तो बिटिया मौज कर ले)
जब मैंने पूछा की पढ़ाई के लिए पैसे क्यों नही हैं... उसने बताया कि पापा उसकी शादी के लिए पैसे जमा कर रहे है न तो पैसे नही बचते... पर मैं हिन्दी पढ़ लेती हू...

उसका सपना है कि किसी दिन सिनेमा हाल मैं जाकर फ़िल्म देखे, जींस और टॉप पहने और किसी बड़े से होटल में खाना खाए. वो चाउमीन और बर्गर खाना चाहती है, नए तरीके से बाल कटवाना चाहती है. वो नए कपड़े पहन कर हमउम्र लड़किओं के साथ खेलना चाहती है. उनकी तरह स्कूल ड्रेस में पढने जाना चाहती है. वो चाहती है कि उसके जन्मदिन पर भी केक काटा जाए...लेकिन वो जानती है कि इन सपनो को पूरा करने के लिए जो समय और पैसा चाहिए वो उसके घरवालों के पास नही है. कल जब उसकी शादी हो जायेगी तब भी वो कही और घरों में काम करेगी और आज कि छोटी रूपा तब कामवाली बाई बन जायेगी.
क्या ऐसी बच्चियां जन्म के साथ ही बड़ी हो जाती हैं. क्या इनका जन्म ही काम और शादी के लिए हुआ है. क्या इनके सपने कभी पूरे नही हो सकते. क्या उसका भविष्य भी दूसरी कामवालियों की तरह हो जायेगा. गुलाब की तरह खिलती एक लड़की कैसे एक कामवाली में तब्दील हो सकती है.

क्या आपके पास कोई जवाब है. इन सवालों का..... हो तो जरा मुझे भी बता दीजिये. मैं बहुत परेशान हू......

10 comments:

राज भाटिय़ा said...

विनिता जी हर सवाल का जवाव हम सब के पास हे,लेकिन हम जानबुझ कर ऎसे सवालो से बच निकलना चाहते, थोडी देर सहनभुति दिखाई ओर वाय वाय.... आप के इस सवाल का जवाव यह हे कि अगर हम मे से हर वो परिवार जो अपनी ऎशियाई (मनोरंजन) से कुछ पेसा निकाल कर सिर्फ़ एक बच्चे की जिम्मेदारी ले ले, तो कितना लाभ होगा इन मासुम बच्चो को, मेने देखा हे भारत मे लोग मंदिरो मे लाखो पुजा मे खर्च करते हे,अरे असली पुजा तो इन बच्चो की मदद हे, इन्हे आगे लाओ, इन की पढाई मे मदद करो

जितेन्द़ भगत said...

भाटि‍या जी ने जो कहा, उसी में मैं एक बात जोडुना चाहूँगा- आप ऐसी बच्‍चि‍यों को मेंहंदी लगाने का कोर्स, सि‍लाई-कढ़ाई का कोर्स करवा सकती हैं, जि‍सपर मुश्‍कि‍ल से दो-तीन सौ रूपये हर माह खर्च होंगे। सोचा जाए तो हम लोग इससे कई गुना रूपये फोन रि‍चार्ज करने में लगा देते हैं। इससे एक लड़की की जि‍न्‍दगी संवर जाएगी, और वो इज्‍जत की रोटी कमा कर खा सकेगी।

Manvinder said...

aap ne ek jawlant mudhe ki or dhayaan kheencha hai...
jaari rakhe

रंजना [रंजू भाटिया] said...

नही ऐसे सवालों के जवाब होते नहीं है पर तालश करने पर हल मिला जाता है पर हम अपने आप में इतने घिरे हुए होते हैं कि उनकी तरफ़ चाह कर भी ध्यान नही देते ...मैंने कई बार ऐसे छोटे बच्चो से पढ़ाई की बात की है पर घर में भाई बहनों की निरंतर बढती संख्या और इनका कम उम्र में ही अपनी सोच से जायदा बड़े हो जाना .इन्हे यह सपने दिखता तो है पर पूर्ण नही कर कर पाता..

सुनीता शानू said...

यह एक आम समस्या है जिससे हम जैसे जाने कितने लोग जूझ रहे है,मेरे यहाँ भी एक छोटी सी बच्ची आती है जिसकी माँ को मैने प्यार से समझाया,डराया धमकाया भी,बच्ची को पढ़ाना तो दूर उसने उसे कई घरों मे काम पर लगा दिया,यह कह कर की अपनी शादी करने के लिये खुद पैसा इकट्ठा कर रही है...मैने मदद करनी चाही तो मेरे पास से बच्ची को ही दूर कर लिया...अब कहिये कैसे मदद की जायेगी?

Nitish Raj said...

kuch sawal aise hote hain jinke jawab hamein pata hote hua bhi hum nahin janana chahate....sirf ye hi jawab hai....

अनुराग said...

कुछ सवाल चलते रहेगे ..जटिल होते रहेंगे ....आप कई बार इस गणित में उलझेगे ....हर बार नाकाम होगे....जिंदगी की ये प्रमेय आसान नही है विनीता जी....

Udan Tashtari said...

मुद्दा विचारणीय है किन्तु उतना सरल उपाय नहीं-एक बहुत बड़ा परिवर्तन सामाजिक व्यवस्था मे हो, इस बात की दरकार है तब ही कुछ हो पायेगा.

Tarun said...

ye utna saral nahi hai jitna dikhta hai, lekin ye pura samajvad ka vishay hai....

sabse bari samasya hai, ki is baat ko madhay varg hi sochta hai....Jaroorat se jyada ameer apni aay barane ke saath uska agar 1-2 percent bhi is kaam ke liye kharch kare to kuch to improvement hoga.

habiba said...

aaj jab ham uttar aadhunik parivesh main jee rahe hai. bade bade mall hamari sanskriti ka hissa ban rahe hai.ham apne ko aadhunik kahlwane ki hod main lakho rupya kharch bina soche samje kar dete hai.madhay varg ki samsya yah hai ki vo kevel sochata hai agar usse kaha jai ki vo apne kharch ko thoda kam karke jaruratbando ki maddad kare to use apni pareshni jayada gambheer lagti hai.