Wednesday, September 17, 2008

हाय हम आम क्यों हुए...

आजकल मेरे साथ बहुत कुछ हो रहा है. दिल लीक से हटकर कही ओर भाग रहा है..हो सकता है आप के साथ न हो रहा हो लेकिन ये सिर्फ़ मेरे साथ हो रहा है....आजकल मन बहुत छोटी छोटी बातों को लेकर दुखी हो रहा है. सरकारी ऑफिस में काम करने वाली महिलाओं को बच्चे पालने के लिए दो साल का सवेतनिक अवकाश और हमारे लिए (private) कुछ भी नही. जे जे केम्प में रहने वालो को काफ़ी कम कीमत पर मकान और हमें कुछ भी नही. केन्द्रीय कर्मियों को इतना भारी एरियर और हमें कुछ भी नही. जब अभिनव बिंद्रा को गोल्ड मिला तो खुशी तो हुई पर जब उसे करोडो का इनाम मिला तो दुःख भी हुआ.. उसके लिए नही अपने लिए...काश हम भी शूटर होते.... सुशील, वीरेंदर को जब करोडो मिले तो दिल रोया.. काश हम भी मुक्केबाज या पहलवान होते तो आज वारे न्यारे हो गये होते. अरे कुछ नही तो राष्ट्रीय स्तर पर कोई खिलाड़ी हो लिए होते कम से कम रेलवे में या कही सरकारी नौकरी तो मिल ही जाती. अरे कम से कम रेलवे में ही जवान बना देता ऊपर वाला. साल भर फ्री की रेल यात्रा ही कर लेते. कभी लगता है कि क्रिकेटर होते तो जम कर मौज और विज्ञापन कर रहे होते. अरे अगर कुछ भी न बचा होता तो हे ऊपर वाले कम से कम नेता ही बना देता. अपने देश में तो खूब पैदावार हो रही है.... एक हम भी सही...नेता होते तो कमाने खाने की चिंता नही होती, सरकारी बंगला, सरकारी गाड़ी ओर करने को कुछ नही. बस कुछ दिन संसद में जाकर जोर जोर से चिल्लाना या एक दो प्रेस कांफ्रेंस.किसी घायल को देखने अस्पताल जाना या फ़िर सड़क पर लेट कर नारेबाजी.
हमसे बढ़िया तो गरीबी रेखा से नीचे रहने वाला (बीपीएल) वो आदमी भी है जिसे चावल ५ रुपये किलो मिल जाता है और झौपडी के बदले एक फ्लैट... अब इस मुए दिल का क्या करे जो बीपीएल होने को उतावला हुआ जा रहा है...
मतलब ये कि कुछ तो होते जो मौज मिल रही होती. मगर उस ऊपर वाले को कुछ और ही मंजूर था. उसने हमें बना दिया मिडिल क्लास यानि आम आदमी. जो मौज नही कर सकता. सरकारी ऐश नही कर सकता. करोडो में नही खेल सकता. अगर कुछ कर सकता है तो वो है दाल रोटी के जुगाड़ की चिंता. हां भाई घूस का ज़माना है...ऊपर वाले को नही खिलाई तो उसने बना दिया आम आदमी जो आम नही खा सकता, हां प्याज के दाम बढ़ने पर आंसू जरूर बहा सकता है. जिन्होंने घूस दी वो बन गये, ख़ास आदमी जो ख़ास सुविधाएं भोग रहे हैं.तो हे ऊपर वाले मेरे दिल की गुहार सुन ले..मुझे इस आम आदमी के सिवा कुछ भी बना दे. ये आम आदमी जो संख्या में सबसे ज्यादा है ओर उतना ही बेशरम... इतनी आफत में भी हंसकर जिए जा रहा है.....

11 comments:

Ranjan said...

सही कहा... लगता है इस तबके पर कोई ध्यान नहीं दे रहा..

रंजना [रंजू भाटिया] said...

मेरी भी अर्जी लगा देना जी .साथ ही ....:) ..सच कहा ..यह दुःख तो हर आम इंसान का साझा है ..चलो मिल कर इसको ही बांटे...स्लाइड शो बहुत पसंद आया :)

pallavi trivedi said...

ये दिल मांगे मोर हमेशा....

Dhruva said...

ha ha ... well said!..

योगेन्द्र मौदगिल said...

Theek Baat hai aapki.........

अनूप शुक्ल said...

आपकी बारी भी लगेगी। आप कतार में हैं।

Ranjeet said...

nice topic...but hum sirf cheela sakte hai......Arz kiya hi..
Safar mein dhoop to hogi jo chal sako to chalo,
sabhi hain bheed mein tum bhi aage nikal sako to chalo.
Raahen kahan kisi k liye badalti hain,
Tum apne aap ko agar badal sako to chalo............

डॉ .अनुराग said...

मेहनत का कोई विकल्प नही....ओर जब किस्मत भी साथ हो ...तो आम को भी ख़ास बनने में वक़्त नही लगता .....

makrand said...

u never know when u got the swing thats called fate

BrijmohanShrivastava said...

मेरा पत्रकारिता से नाता न होने से पहला लेख तो मेरी समझ से बाहर हो गया ,दूसरा हाय हम आम क्यों हुए अच्छा लगा वैसे मैंने एक लेख नुमा तुकबंदी लिखी थी ""आम आदमी की ग़ज़ल " उसमें जरूर कुछ आम और ख़ास में अन्तर बताने की कोशिश की थी

BrijmohanShrivastava said...

लेख अच्छी तरह और बार बार पढने के बाद मैं यह निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि लेख लिखने की पहली कोशिश नही हो सकती पी एस सी फेस करते वक्त माना कि गहन अध्ययन के कारण समय न मिल पाया होगा मगर इससे पूर्व जरूर साहित्य से जुड़े रहे होंगे क्योंकि प्रतियागिता दर्पण और कंपटीसन सक्सेस वाला इतना बढ़िया लेखक नहीं हो सकता / हाँ हिन्दी साहित्य एक विषय रहा हो तो अलग बात है